छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ कवि, साहित्यकार और पत्रकार पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी का निधन


छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ कवि, साहित्यकार और पत्रकार पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी के निधन हो गया छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है| भारत सरकार से पद्मश्री सम्मानित और छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के प्रथम अध्यक्ष श्री चतुर्वेदी का निधन उनके गृह नगर बिलासपुर के एक अस्पताल में हुआ|

उनके पुत्र बिलासपुर के वरिष्ठ पत्रकार श्री सूर्यकांत चतुर्वेदी है| लोकप्रिय साहित्यकार पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी के निधन से छत्तीसगढ़ में साहित्य और पत्रकारिता के एक सुनहरे युग का अंत हो गया। वह ऋषि तुल्य साहित्यकार थे।

प्रमुख्य बातें – 

  1. पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी छत्तीसगढ़ी और हिन्दी भाषाओं के विद्वान लेखक, चिन्तक और संवेदनशील कवि थे, जिन्होंने लगभग सात दशकों तक अपनी रचनाओं से प्रदेश के लोक साहित्य और यहां की लोक संस्कृति के विकास में अपना अमूल्य योगदान दिया।
  2. पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी को साहित्य के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा वर्ष 2004 में राज्य स्थापना दिवस ’राज्योत्सव’ के अवसर पर पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों राजधानी रायपुर में पंडित सुन्दरलाल शर्मा राज्य अलंकरण से सम्मानित किया गया था। उन्हें और वरिष्ठ साहित्यकार स्वर्गीय लाला जगदलपुरी को संयुक्त रूप से यह सम्मान प्रदान किया गया था। पंडित चतुर्वेदी को इस वर्ष 02 अप्रैल को भारत सरकार द्वारा पद्मश्री अलंकरण से भी सम्मानित किया गया था।
  3. राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति में 02 अप्रैल 2018 को राष्ट्रपति भवन नई दिल्ली में आयोजित समारोह में पंडित चतुर्वेदी को पद्मश्री अलंकरण से नवाजा था। पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी का जन्म 20 फरवरी 1926 को तत्कालीन बिलासपुर जिले के अकलतरा के पास ग्राम कोटमी सोनार में हुआ था। वह कोटमी सोनार ग्राम पंचायत के सरपंच भी रह चुके थे। उन्होंने लम्बे समय तक कई प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के बिलासपुर जिला संवाददाता के रूप में भी काम किया। उन्होंने 1941 से कविता लिखना शुरू किया था। उनकी हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कविताओं का प्रसारण समय-समय पर आकाशवाणी और दूरदर्शन केन्द्रों से भी होता रहा।
  4. उनके छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह ’भोलवा भोलाराम बनिस’ और कविता संग्रह ’पर्रा भर लाई’ को छत्तीसगढ़ के आंचलिक साहित्य की महत्वपूर्ण कृतियों में गिना जाता है।
  5. वर्ष 1986-87 में गुरू घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर और वर्ष 1998 में पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर में उनके साहित्यिक योगदान पर पीएचडी भी की गई। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर के एमए (वैकल्पिक विषय) छत्तीसगढ़ी के पाठ्यक्रम में और छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल की कक्षा 12वीं के पाठ्यक्रम में विशिष्ट हिन्दी पाठ्यक्रम में भी पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी की रचनाएं शामिल हैं।
  6. छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य एवं लोक कला मंच भाटापारा द्वारा प्रदत्त ’हरिठाकुर सम्मान’ वर्ष 2003 में सृजन सम्मान संस्था रायपुर द्वारा ’हिन्दी गौरव सम्मान’ सहित पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर की संस्था बख्शी सृजन पीठ द्वारा प्रदत्त ’साधना सम्मान’ भी शामिल है। उन्हें उनकी षष्टि पूर्ति पर भातेन्दु साहित्य समिति बिलासपुर द्वारा अभिनंदनग्रंथ भेंट किया गया था। साथ ही साथ उन्हें महाराष्ट्र मंडल रायपुर द्वारा वर्ष 2002 में मुक्तिबोध सम्मान और भिलाई नगर में वर्ष 2002 में वसुंधरा सम्मान से भी नवाजा गया|
  7. वह छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के संरक्षक और भारतेन्दु साहित्य समिति बिलासपुर के उपाध्यक्ष के अलावा लगभग दस वर्षों तक बिलासपुर जिला सहकारी केन्द्रीय बैंक के संचालक मंडल और छत्तीसगढ़ हिन्दी ग्रंथ अकादमी की कार्यकारिणी के सदस्य भी रहे।

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