राजनैतिक शब्दावली – महत्वपूर्ण बिंदु


अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion) – संसदीय शासन में मंत्रिमंडल तभी तक पदासीन रहती है,जब तक उसे लोकसभा के बहुतमत का समर्थन हो| यदि लोकसभा मंत्रिपरिषद या कार्यपालिका से असंतुष्ट है , तो वह उसके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव ला सकती है| इस प्रस्ताव पर लोकसभा के 1/10 सदस्यों का अनुसमर्थन चाहिए| इसे लोकसभा में प्रस्तुत किये जाने के बाद यदि लोकसभा का बहुमत इसे स्वीकार करता है,तो कार्यपालिका बर्खास्त हो जाती है| वास्तव में यह कार्यपालिका के नियंत्रण का एक महत्वपूर्ण साधन है| इसका उल्लेख लोकसभा के प्रक्रिया एवं कार्य सञ्चालन नियम 198 में किया गया है| इसका प्रयोग सर्वप्रथम 1962 में किया गया था|

निंदा प्रस्ताव(Censure Motion) – ‘निंदा प्रस्ताव’ का उल्लेख प्रक्रिया एवं कार्य संचालन नियम 184 से 189 तक में किया गया है| निंदा प्रस्ताव में निंदा का कारण बताना जरुरी है | यदि लोकसभा अध्यक्ष यह समझाता है की प्रस्ताव निंदा करने लायक है, तो वह इसे स्वीकृति दे सकता है| इस प्रस्ताव द्वारा सदन के सदस्य किसी मंत्री या पूरी मंत्रिपरिषद के किसी कार्य की निंदा करते है| इसमें सदस्यों द्वारा रोष व्यक्त किया जाता है तथा उसकी विफलता को निंदा का आधार बनाया जाता है| इस प्रस्ताव का उद्देश्य कार्यपालिका को सजग करना भी है| यह एक साधारण प्रस्ताव है|

स्थगन प्रस्ताव(Adjournment Motion) – ‘स्थगन प्रस्ताव’ सार्वजनिक महत्व के विषयों से सम्बन्ध है| यह प्रस्ताव सांसद के दोनों सदनों में लाया जा सकता है| यदि स्थगन प्रस्ताव लाया जाता है, तो उक्त तिथि को दस बजे से पहले अध्यक्ष को सूचित करना पड़ता है| यदि अध्यक्ष सहमत है तो उसकी स्वीकृति से स्थगन प्रस्ताव लाया जा सकता है| इसे प्रस्तुत करने से पहले अध्यक्ष उसे सदन की अनुमति लेने को भी कह सकता है| यदि संसद के दोनों सदनों का सत्र चल रहा हो एवं कोई सार्वजनिक महत्व की घटना हो जाये, तो इस प्रस्ताव द्वारा सदन के सदस्य लोकसभा के नियमित काम को रोक कर, उस लोक महत्व के प्रश्न पर चर्चा करते है|

ध्यानाकर्षण प्रस्ताव (Calling Attention Notice) – ‘ध्यानाकर्षण प्रस्ताव(Calling Attention Notice)’ का प्रयोग भारत में 1954 से हो रहा है| प्रक्रिया व कार्य संचालन नियम 197 में इसकी चर्चा है| इस प्रस्ताव द्वारा सदन के सदस्य सरकार का ध्यान लोक महत्व के उस विषय की ओर दिलाते है, जो बहुत जरुरी होता है| इस प्रस्ताव की सूचना भी उक्त तिथि को 10 बजे दिन से पूर्ण लोकसभा के अध्यक्ष को देनी होता है| अध्यक्ष अनुमति के बाद ही प्रस्ताव पेश किया जाता है| इस ध्यानाकर्षण प्रस्ताव का आधार समाचार पत्रों में छापी घटनाएं आदि होती हैं|

आधे घंटे की चर्चा(Half-An-Hour Discussion) – यह प्रस्ताव ऐसे प्रश्न पर उत्पन्न होता है, जिसका उत्तर सदन में पहले से ही दिया जा चूका है| आधे घंटे की चर्चा का सम्बन्ध भी लोक महत्व के प्रश्न से होता है| कार्य सञ्चालन नियम की धारा 55 में इसका उल्लेख है| यह चर्चा सदन की समाप्ति से ठीक आधे घंटे पहले शुरू की जाती है| यदि इस प्रस्ताव की सूचना लोकसभा अध्यक्ष एवं राज्यसभा के सभापति के कम-से-कम तीन दिन पूर्व देनी पड़ती है|

अल्पकालीन चर्चाएं (Short Duration Discussions) – ये चर्चाएं संसद के दोनों सदनों में उठाई जाती है| अल्पकालीन चर्चाओं का सम्बन्ध भी अविलंबनीय कार्य एवं प्रक्रिया सञ्चालन अधिनियम 193 में किया गया है| ऐसी चर्चा की सूचना दो सदस्यों के समर्थन में महासचिव को दी जाती है| उसके बाद अध्यक्ष की स्वीकृति से चर्चा की जाती है| यदि अध्यक्ष इंकार कर दे, तो प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है| यह सदन की बैठक की समाप्ति से आधे या एक घंटे पहले शुरू की जा सकती है| इस प्रस्ताव के उत्तर में मंत्री को उत्तर देना पड़ता है|

शून्य काल(Zero Hour) – प्रश्न काल के तुरंत बाद का घंटा शून्य काल कहलाता है| संसद के सदस्य शून्य काल में सार्वजनिक हित से सम्बंधित मामलों को उठाते है| पहले यह 30 मिनट का होता था, परन्तु रविराय के लोकसभाध्यक्ष के कार्यकाल में इसे बढाकर एक घंटे कर दिया गया था|

अल्प सूचना प्रश्न(Short-Notice Question) – ‘अल्प सूचना प्रश्न(Short-Notice Question) ‘ अति महत्व के प्रश्न होते है| इनका सम्बन्ध प्रायः सार्वजनिक महत्व के प्रश्नों से होता है| यह प्रश्न लोकसभाध्यक्ष को 10 दिन से कम अवधि की सूचना देकर पूछने की अनुमति मांगी जाती है| यदि अध्यक्ष समझता है कि सूचना देकर पूछने की अनुमति मांगी जाती है| यदि अध्यक्ष समझता है कि प्रश्न लोक महत्व का है, तो वह इसे पूछने की इजाजत दे सकता है| प्रश्न काल की समाप्ति के बाद किसी निर्धारित दिन यह प्रश्न किया जा सकता है|

तारांकित प्रश्न (Starred Question) – तारांकित प्रश्न वह प्रश्न होता है, जिसका उत्तर मंत्रियों को मौखिक रूप से देना पड़ता है चूँकि इसमें तारांक लगा होता है,इसलिए इसे तारांकित प्रश्न कहते है| इसका उल्लेख कार्य संचालन नियम 36 में किया गया है| इसमें मंत्रियों से पूरक एवं अनुपूरक प्रश्न भी पूछे जाते है|

अतारांकित प्रश्न(Unstarred Question) – चूँकि इस प्रकार के प्रश्न में तारांक नहीं लगा होता है, इसलिए इसे अतारांकित प्रश्न कहते है| इसका उत्तर लिखित रूप से देना पड़ता है| इसका उल्लेख लोक कार्य संचालन नियम 39 में है| इसमें अनुपूरक प्रश्न नहीं पूछे जाते|

व्यवस्था का प्रश्न(Point of order) – व्यवस्था का प्रश्न सदन में तभी उठता है,जब सदन की मान्य परम्परा एवं नियमों का उल्लंघन किया जा रहा हो| इसमें यह बताना पड़ता है की किस नियम का उल्लंघन हो रहा है या किस प्रक्रिया की अवहेलना हो रही है| यदि सभापति या अध्यक्ष सहमति देता है, तो व्यवस्था का प्रश्न दोनों सदनों में उठाया जा सकता है|

कटौती प्रस्ताव (Cut Motion) – यह ऐसा प्रस्ताव है, जिसके द्वारा सदन के सदस्य सरकार के किसी विभाग की धनराशि में कटौती की मांग करते हैं| कटौती प्रस्ताव के तीन प्रकार है:

  1. नीतिगत कटौती – इसमें सरकार के सिंदान्तों या नीतियों से असमहति व्यक्त की जाती है|
  2. अर्थगत कटौती : किसी खास मद में माँगी गयी राशि में कुछ कटौती से ऐसा प्रस्ताव सम्बंधित होता है, एवं
  3. सांकेतिक या प्रतीक कटौती : इस प्रस्ताव में सरकार की किसी मद में माँगी गयी राशि का विरोध किया जाता है| विरोध करने का तरीका यह है कि मांगी गयी में संकेत के रूप में 100 रूपये की कटौती की
    माँग की जाती है|

व्हिप/सचेतक (Whip) : ‘व्हिप’ शब्द का आशय ‘लगाम’, ‘कोड़ा’ या ‘फटकारया’, ‘सावधान, ‘सचेत ‘ करना है। जब संसद के दोनों सदनों में मतदान का समय आता है, तो प्रत्येक दल अपने सदस्यों को मतदान में भाग लेने के लिए ‘व्हिप’ जारी करता है। प्रत्येक दल का एक सचेतक होता है, जो दल में ‘ व्हिप’ के माध्यम से अनुशासन बनाये रखता है।

अभिभाषण (Address) : यहाँ अभिभाषण से आशय राष्ट्रपति या राज्यपाल के अभिभाषण से है। चुनाव के तुरन्त बाद संसद के संयुक्त सत्र को राष्ट्रपति द्वारा या दोनों सदनों की प्रथम बैठक के दौरान राष्ट्रपति द्वारा संयुक्त सदन को संबोधित करना ही अभिभाषण कहलाता है। राज्यों में राज्यपाल भी चुनाव के तुरन्त बाद या प्रथम वर्ष की संयुक्त बैठक के दौरान राज्य विधानमंडल में इसी तरह का अभिभाषण करता है।

प्रदत्त विधान (Delegated Legislation) : ‘प्रदत्त विधान’ शब्द से आशय है- कानून बनाने की शक्ति किसी को देना। आधुनिक समय में विधायिकाओं के कार्य बढ़ गये हैं, फलत: सभी कार्यों का वह ठीक से संपादन पूर्व नहीं कर पाती । ऐसे में वह अपने विधान बनाने की शक्ति को कार्यपालिका दल या किसी सक्षम प्राधिकारी को सौंप सकती है। इसे प्रदत्त विधान इसलिए कहते हैं, क्योंकि शक्ति दी जाती है, प्रदत्त की जाती है। इसमें मूल सत्ता की शक्ति में ह्रास नहीं होता है।

फोर्थ एस्टेट (Fourth State) : समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं की दुनिया को फोर्थ स्टेट या ‘चौथा स्तम्भ’ (लोकतंत्र का) कहा जाता है।

फोर्थ वर्ल्ड (Fourth World) : फोर्थ वर्ल्ड ऐसे देशों को कहते है, जो तेल की कीमत बढ़ा दिये जाने के कारण बचाव की गुहार करने लगते हैं। अधिकतर तीसरी दुनिया के देश ही ‘फोर्थ वल्र्ड’ में आते हैं।

गिलोटिन (Gulletine) : यह एक फ्रांसीसी हथियार है, जिसका प्रयोग सिर काटने में किया जाता है। आजकल यह शब्द संसदीय देशों में प्रयुक्त होने लगा है। सत्र के दौरान जब किसी निर्धारित विषय की समाप्ति के साथ ही समस्त वाद विवाद की प्रक्रिया एकाएक खत्म कर दी जाती है, तो इसे गिलोटीन कहते हैं। यह संसद सदस्यों की वादविवाद की आगे की इच्छा का दमन करने के कारण ही गिलोटिन कहलाया। अर्थात् अन्तिम दिन जिन मांगों पर चर्चा न हुई हो उन्हें भी मतदान के लिए रख दिया जाता है| इस प्रक्रिया को जिसमे अधिकांश मांग बिना चर्चा के पास हो जाती है, गिलोटिन कहते है|

गणपूर्ति (Quorrum) : गणपूर्ति संसद के दोनों सदनों की न्यूनतम संख्या से संबंधित है। दोनों सदनों में इसके लिए न्यूनतम 1/10 सदस्यों की संख्या निश्चित की गयी है। यदि 1/10 सदस्य नहीं पूरे होते, तो संसद के किसी भी सदन की बैठक नहीं हो सकती।

अध्यादेश (0rdinance) : जब संसद या राज्य विधानमंडल सत्र में न हो एवं कोई आवश्यक समस्या उत्पन्न हो जाये, तो इससे निपटने के लिए राष्ट्रपति एवं
राज्यपाल को क्रमश: धारा 123 एवं 213 के अन्तर्गत अध्यादेश जारी करने का अधिकार है। अध्यादेश का वही महत्व है, जो संसद द्वारा निर्मित कानूनों को प्राप्त है। यदि संसद या राज्य विधानमंडल के निम्न सदन इसे अपनी प्रथम बैठक में स्वीकृति नहीं देते, तो बैठक की तारीख से 6 सप्ताह बाद अध्यादेश स्वत: खत्म हो जाता है।

वापस बुलाना (Recall) : इसमें जनता अपने प्रतिनिधियों को उसके दुराचरण के कारण प्रतिनिधि मानने से इंकार कर देती है एवं उसे वापस बुलाने मांग करती है। ऐसा प्रश्न निर्धारित संख्या में प्रस्तुत किये जाने पर उस पर जनमत संग्रह होता है। यदि जनता रिकॉल का समर्थन करती है, तो प्रतिनिधि पदच्युत हो जाता है। स्विट्जरलैंड के कुछ कैन्टनों में यह प्रथा प्रचलित है। मध्य प्रदेश में कुछ पंचायत प्रमुखों को इसके तहत हटाया गया था।

किचन कैबिनेट (Kitchen Cabinet ) : संसदीय शासन में मंत्रिमंडलीय सरकार काम करती है। यह मंत्रिमंडल का वह नाम है, जिसमें मंत्रिमंडल में कुछ महत्वपूर्ण एवं वरिष्ठ सदस्य ही रहते हैं। ये संख्या में तो कम होते हैं, परन्तु सभी महत्वपूर्ण निर्णय यही लोग लेते हैं। इसीलिए इसे किचन कैबिनेट कहते है|

स्पॉइल सिस्टम (Spoil system) : यह वस्तुत: पदों की लूट है, जो संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रचलित है। अमेरिका में जैसे ही नया राष्ट्रपति पद धारण करता है, उसके समर्थक लोगों में पद पाने के लिए लूटमार मच जाती है। भारत में भी अंशत: यह लूट पद्धति फैलती जा रही है।

सार्वजनिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Sufrage): यह मताधिकार की एक सर्वमान्य पद्धति है। इस पद्धति के अन्तर्गत एक निर्धारित उम्र प्राप्त कर लेने वाले स्त्री-पुरुषों को निर्वाचन में मतदान का अधिकार प्राप्त हो जाता है। भारत में पहले मतदान की आयु 21 वर्ष थी, संविधान के 61वें संशोधन द्वारा यह घटाकर 18 वर्ष कर दी गयी।

ओपिनियन पोल (राय मतदान) (0pinion Poll) : जब चुनावों से पूर्व या चुनावों के दौरान संचार माध्यम विभिन्न लोगों की राय जानकार किसी दल या प्रत्याशी की जीत-हार का दावा करता है, तो इसे ‘ओपिनियन पोल’ कहते हैं। इसमें मतदाताओं के बीच राय-शुमारी की जाती है।

एक्जिट पोल (निकासी मतदान) (Exit Pol) : निकासी मतदान वह प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत मतदान केन्द्र से मत देकर बाहर निकलते मतदाताओं से पूछा जाता है कि उन्होंने किस दल या प्रत्याशी को वोट दिये एवं इसी आधार पर किसी प्रत्याशी या दल की चुनावों में जीत-हार का पता लगाया जाता है। भारत में ‘ओपिनियन पोल’ एवं ‘एक्जिट पोल’ जैसे साधनों का प्रचलन पिछले कुछ चुनावों से बढ़ा है।

स्नेप पोल (Snap Pol) : यह तत्काल चुनाव से संबंधित व्यवस्था है। राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा संसद या राज्य विधान सभाओं को भंग कर त्वरित रूप से नया चुनाव करा लेना ही स्नैप पोल कहलाता है।

निर्णायक मत (Cast vote) : जब मतदान के समय (दोनों सदनों में) किसी प्रस्ताव पर बराबर-बराबर मत पड़ता है, तो लोक सभाध्यक्ष एवं राज्यसभा के सभापति को निर्णायक मत देने का अधिकार होता है। इसे ही ‘निर्णायक मत’ कहा जाता है|

ओम्बड्समैन (Dabudsman): यह एक स्कैण्डेनेवियन पद्धति है। यह एक प्रकार का सतर्कता अधिकारी है, जो उच्च पदों में व्याप्त भ्रष्टाचार की देखरेख करता है, उसकी जाँच करता है। भारत में ओम्बड्समैन के प्रतिमान ‘लोकपाल’ एवं ‘लोकायुक्त’ हैं। भारत के कई राज्यों में लोकायुक्त है, पर अभी तक केन्द्र में लोकपाल का पद नहीं बन पाया है। यह पद्धति सर्वप्रथम स्वीडन में 1809 ई. में लागू की गयी थी। सर्वप्रथम महाराष्ट्र ने लोकायुक्त संस्था की स्थापना की।

लाल फीताशाही (Red Tapeism) : यह ऐसी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा आवश्यक कार्यों में अनावश्यक विलम्ब होता है। अधिकतर सरकारी फाइलें लाल फीते से बंधी होती हैं एवं इसे एक-एक टेबुल से गुजरना पड़ता है, तब जाकर अंतिम सत्ता का हस्ताक्षर होता है। चूंकि यह महत्वपूर्ण कार्यों को भी प्रक्रियागत तरीके से निबटाता है, उलझा देता है, इसलिए इसे लालफीताशाही कहते हैं।

प्रत्यर्पण (Extradition) : कोई अपराधी जब किसी देश में अपराध करने के बाद निकल भागता है और दूसरे देश की सीमा में शरण लेता है, तो उस देश द्वारा अपराधी को पुन: उसी देश को सौंप दिया जाना जिस देश में अपराधी ने अपराध किया प्रत्यर्पण कहलाता है।

विधि की उचित प्रक्रिया (Due Process of Law) : विधि की उचित प्रक्रिया से आशय है कि किसी व्यक्ति को विधि की उचित प्रक्रिया से ही जीवन स्वतंत्रता एवं सम्पत्ति के अधिकार से वंचित किया जा सकता है, अन्यथा नहीं। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत अमेरिकी न्यायालय प्राकृतिक एवं नैसर्गिक न्याय के आधार पर भी फैसला करते हैं।

विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया (Due Process Established by Law) : इस प्रक्रिया के अन्तर्गत सिर्फ विधि जो कानून प्रख्यापित करती है, उसी आधार पर व्यक्ति को अधिकारों से वंचित किया जा सकता है। इसमें भारतीय न्यायपालिका को नैसर्गिक आधार पर फैसला करने का अधिकार नहीं है। वह कानून के गुणदोष पर विचार नहीं कर सकती।

विधि का शासन (Rule of Law) : विधि का शासन इंग्लैंड की देन है। इसे भारत में भी अपनाया गया है। कोई व्यक्ति चाहे वह कोई भी पदधारी हो, विधि से शासित होता है। परन्तु, विधि का शासन यह भी कहता है कि किसी भी व्यक्ति को शारीरिक या आर्थिक दण्ड तब तक नहीं दिया जा सकता, जब तक वह स्पष्टत: विधि विरुद्ध आचरण नहीं करे एवं उनका यह आचरण न्यायालय में सिद्ध न हो जाये।

द्विसदनात्मक व्यवस्था (Bi-cameralism) : बाईकैमरलिज्म से आशय द्विसदनात्मक पद्धति से है। जहाँ कहीं भी विधायिका के दो सदन हैं, वहां यह व्यवस्था बाई कैमरेलिज्म कही जाती है

विधेयक (Bil): यह कानून का पूर्व रूप है। यह वह प्रारूप है जिसे कानून बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडल में प्रस्तुत करना पड़ता है। संसद या राज्य विधानमंडलों के दोनों सदनों द्वारा पारित होने एवं राष्ट्रपति या राज्यपाल की स्वीकृति मिल जाने के बाद प्रस्तुत विधेयक कानून का रूप ले लेता है।

पश्चक (Back Bencher) : पश्चक उस सांसद या विधायक को कहते हैं, जो सदन की समस्त कार्रवाइयों से उदासीन रहता है एवं पीछे की पंक्तियों में बैठता है।

विनियोग विधेयक (Appropriation Bil) : यह भी धन विधेयक ही है। जब संसद में प्राक्कलनों पर विचार हो चुका होता है, तो ये सभी प्राक्कलन एक विनियोग के रूप में अनुच्छेद 114 के अन्तर्गत बदल जाते हैं। विनियोग विधेयक यह बताता है कि इस-इस मद में इतने-इतने आय-व्यय होंगे। इसी के आधार पर विनियोग के माध्यम से भारत की संचित निधि से धन लिया जाता है, इसीलिए इसे ‘विनियोग विधेयक कहते हैं।

लेखानुदान (Vote-on Accounts) : जब संसद में बजट सत्र पर चर्चा शुरू होती है, तो इस पर लम्बी चर्चा चलती है। इस बीच के महीनों पर सरकार का खर्च कैसे चले, इसी की व्याख्यता ‘लेखानुदान’ है| लेखानुदान के माध्यम से सरकार पुरे बजटीय वर्ष के रूपये से लोक लेखे के माध्यम से एक निश्चित राशि निश्चित अवधी के लिए निकल लेती है| इसे लोकसभा बाधित नहीं करती| वह इस राशि को स्वीकार कर लेती है| इसे ही लेखानुदान कहते है| अनुच्छेद 116(1) में इसकी चर्चा है|

अनुपूरक एवं अतिरिक्त अनुदान की माँगें (Supplemental and Excess Demand for Grants): संसद की स्वीकृति के बिना उसके द्वारा स्वीकृति राशि से अधिक राशि खर्च नहीं की जा सकती है। यदि किसी प्रयोजन के लिए कोई राशि कम पड़ जाती है, तो राष्ट्रपति उसके पूरक राशि के रूप में ‘अनुपूरक राशि’ को दोनों सदनों में रखवाता है। इसे अनुपूरक अनुदान कहते हैं। जब किसी निर्धारित राशि- से अधिक राशि किसी मत में खर्च हो जाती है, तो राष्ट्रपति इस खर्च की पूर्ति के लिए अतिरिक्त राशि’ की माँग दोनों सदनों में रखवाता है। इसे ‘अतिरिक्त अनुदान ‘कहते हैं। इसकी चर्चा संविधान के अनुच्छेद 115 में की गयी है।

प्रत्यायानुदान एवं अपवादानुदान (Vote of credit and Exception Grant): प्रत्यायानुदान तब लिया जाता है, जब संकट की स्थिति एकाएक उत्पन्न हो जाये एवं धन की कमी हो जाये। ऐसे में कार्यपालिका अर्थात् सरकार को धन की स्वीकृति संसद से लेनी पड़ती है, जो संसद तुरन्त दे देती है। वह प्रत्यायानुदान के समय धन का ब्यौरा नहीं माँगती। अपवादानुदान किसी विशिष्ट ध्येय की पूर्ति के लिए दिया जाता है। यह वित्तीय वर्ष के खर्च का भाग नहीं होता है। अनुच्छेद 116 में इनकी चर्चा की गयी है।

वित्त विधेयक (Finance Bil) : प्राय: वित्त विधेयक ऐसे विधेयक होते हैं, जिनमें राजस्व एवं विभिन्न करों आदि का उल्लेख होता है। धन विधेयक से भिन्न इनका उपबंध अन्य मामलों के लिए भी किया जा सकता है। जब यह भारत की संचित निधि पर व्यय को भारित करता है, तो इसे वित्त विधेयक कहते हैं। इसकी कुछ चर्चा अनुच्छेद 117 में की गयी है। यह राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति से ही प्रस्तुत किया जा सकता है।

धन विधेयक (Money Bil) : धन विधेयक वह विधेयक होता है, जिसमें किसी प्रकार का करारोपण,परिहार या निलम्बन या परिवर्तन, आदि रहता है। कोई भी विधेयक, जिसमें भारत की संचित निधि से खर्च की बात हो या भारत सरकार के ऋण या कोई व्यय की बात हो तो ऐसे विधेयक को धनविधेयक कहते हैं| संविधान के अनुच्छेद 110 के अनुसार, लोकसभाध्यक्ष ही इस बात को प्रमाणित करता है कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं। इसे प्रस्तुत करने के लिए (लोकसभा में) राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति आवश्यक है।

संचित निधि (Consolidated Fund) : भारतीय संविधान के अनुच्छेद 266 के अनुसार, भारत के लिए एक संचित निधि होगी। संचित निधि में विभिन्न उधार, करों एवं राजस्वों से प्राप्त आय, अन्य साधनों से लिए गये अग्रिम धन एवं विभिन्न प्राप्तियाँ आदि शामिल हैं। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति एवं उपसभापति लोकसभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष, भारत का नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक तथा न्यायाधीशों (सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालय) के वेतन एवं भत्ते भारत की संचित निधि पर ही भारित होते हैं। राज्यों के संबंध में राज्यों की संचित निधि में करों एवं राजस्वों से प्राप्त आय, अन्य शुद्ध आगम, अन्य साधनों से लिया गया अग्रिम धन, विभिन्न उधार एवं प्राप्त अन्य राशियों आदि आती हैं। अनुच्छेद 266(3) के अनुसार, भारत की या राज्य की संचित निधि से धन विधिक प्रक्रिया के द्वारा ही निकाला जा सकता है, अन्यथा नहीं।

आकस्मिक निधि (Contingency Fund) : भारतीय संविधान के अनुच्छेद 267(1) के अनुसार, संसद विधि द्वारा अग्रदाय के रूप लिए ‘आकस्मिक निधि’
एक निधि व्यवस्था करेगी, जिसमें विधि द्वारा प्रख्यापित राशियाँ राखी जायेंगी| इस पर राष्ट्रपति का अधिकार होगा| संसद विधि द्वारा सरकार को इसमें से अग्रिम धन खास उद्देश्यों की पूर्ति के लिए दे सकती है| संविधान के अनुच्छेद 267(2) में कहा गया है कि राज्य का विधानमंडल विधि द्वारा अग्रदाय के रूप में राज्य के लिए एक ‘आकस्मिक निधि’ की स्थापना करेगा, जिसमे राज्य विधानमंडल द्वारा अवधारित राशियां जमा की जाएगी| इस पर राज्यपाल का नियंत्रण होगा| राज्य विधानमंडल किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए इसमें से अग्रिम धन दे सकता है|

पॉलिटिकल सैबोटेज (Political sabotage): जब किसी देश में कोई दल या सरकार किसी दूसरे दल या सरकार को गुप्त रूप से नष्ट करने की योजना बनाती है, तो उसे पॉलिटिकल सैबोटेज कहते हैं।

प्रत्यक्ष प्रजातंत्र (Direct Democracy): यह प्रजातांत्रिक शासन का वह रूप है, जिसमें जनता शासन कार्यों में सीधी भागीदारी करती है तथा कानून बनाती है। यह व्यवस्था स्विट्जरलैंड में है।

अप्रत्यक्ष प्रजांत (Indirect Democracy): इसमें जनता शासन वर्षों में खुद भाग न लेकर,अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से शासन कार्यों में भागीदारी करती है। भारत, ब्रिटेन, अमेरिका, सहित दुनियां के अधिकतर देशों से अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र ही पाया जाता है।

जनमत संग्रह (Referendum): जब कोई विधेयक या वस्तु विवाद का विषय बन जाता है, तो उस पर जनता की राय का संग्रह कराया जाता है। इसे ही
जनमत संग्रह कहते हैं। यह पद्धति स्विट्जरलैंड के प्रत्यक्ष प्रजातंत्र में पायी जाती है।

हंग पार्लियामेंट Hung Parliament): जब लोकसभा (त्रिशंकु संसद) में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता या विधायिका में अनेक छोटे-छोटे दल आ जाते हैं, जिसके कारण किसी दल के लिए सरकार बनाना सरल नहीं होता तो ऐसी संसद को या विधायिका को त्रिशंकु संसद या हंग पार्लियामेंट की संज्ञा दी जाती है। यह ऐसी स्थिति है, जब संसद में किसी की सरकार बनती नहीं दिखती।

श्वेत पत्र (White Paper): श्वेत पत्र वास्तव में वह प्रलेख है,जिसमें सरकार से संबंधित चीजों को उजागर करने को कहा है। सरकार ने बीते या वर्तमान वर्ष के दौरान जो भी कार्य किये हैं, उनका उल्लेख जब सादे कागजों पर किया जाता है, तो उसे ‘श्वेत पत्र कहते हैं।

अनुपस्थित मतदान (Absentee voting): अप्रत्यक्ष प्रजातंत्र में प्रत्येक मतदाता को मतदान केन्द्र पर जाकर ही मतदान करना पड़ता है। परन्तु, कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो अनुपस्थित मतदान का उपयोग करते हैं। इसमें डाक द्वारा मतदान में भाग या हिस्सा लिया जाता है। भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभाध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष, राज्यसभा के सभापति एवं उपसभापति, राज्यपाल, विदेशों में रह रहे राजदूत, उनकी पत्नियाँ एवं वयस्क बच्चे (यदि वे भारत के नागरिक हैं) सैनिक तथा निर्वाचन कार्य में लगे लोगों को अनुपस्थित मतदान अर्थात डाक से मतदान करने का अधिकार प्राप्त होता है।

कॉकस (Caucus) : कॉकस किसी दल या सरकार के उस छोटे गुट को कहते हैं, जो दल या उससे सम्बन्धित सभी महत्वपूर्ण नीतियों को निर्धारित करता है, उसे लागू करता है|

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