छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास ( Part-7 शरभपुरीय वंश )


Chhattisgarh history notes –  about sharabhpuriya vansh

  • संस्थापक :- शरभराज – शरभपुर आधुनिक सारंगढ़ ( शरभपुरीय वंश का शासनकाल 475 से 590 तक था।)
  • इनका शासन काल ईसा के 6 वीं शताब्दी में था ।
  • इस वंश को अमरार्य / अमरज कुल भी कहा जाता था।
  • इस वंश के लेख सम्बलपुर(ओडिशा) से प्राप्त अतः इतिहास कार सम्बलपुर को ही सरभपुर मानते है ।
  • उत्तर कालीन गुप्त शासक भानुगुप्त के “एरण स्तंभलेख(गुप्त संवत 510 ई.) में शरभराज का उल्लेख मिलता है ।

क्षेत्र :- उत्तर – पूर्वी क्षेत्र (मल्हार , सारंगढ़ , रायगढ़, संबलपुर )

उप राजधानी :- श्रीपुर( सिरपुर )

मुख शासक :–

  1. शरभराज 
  2. नरेंद्र:- शरभराज का उत्तराधिकारी ।
    1. इसके तीन ताम्रपत्र प्राप्त हुये है।
    2. ये तीन ताम्रपत्र पिपरदुला, कुरुद, रवां स्रोत हैं।
    3. उन्हें विष्णु के उपासक के रूप में उल्लेखित किया गया है।
  3. प्रसन्नमात्र:- सर्वाधिक प्रतापी राजा( विष्णु भक्त )
    1. इसने अपने नाम से प्रसन्नपुर नमक नगर की स्थापना की थी, जो निडिल नदी के किनारे स्थित था जिसका तादात्म्य मल्हार में स्थापित है।
    2. प्रसन्नमात्र इकलौता शरभपुरीय राजा है जिसके सोने के सिक्को खोज की गई है।
    3. इनमे वह प्रसन्नमात्र के रूप में उल्लेख किया गया है।
    4. सिक्के महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ क्षेत्र में उड़ीसा, चंदा में कालाहांडी जैसे विभिन्न क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
    5. प्रसन्नपुर (मल्हार) की स्थापना किया।
    6. गरुण, शंख ,चक्र आदि सिक्के चलाये।
  4. प्रवरराज प्रथम :- इसने राजधानी शरभपुर से श्रीपुर स्थापित की थी। प्रवरराज प्रथम के दो ताम्रपत्र ठाकुरदिया एवं मल्लार प्राप्त हुये है।
  5. सुदेव राज:- प्रवरराज प्रथम का उत्तराधिकारी ।इनके सात ताम्रपत्र प्राप्त हुये है जो इस राजवंश में सर्वाधिक है। सात ताम्रपत्र नन्हा , धमतरी, सिरपुर, आरंग, कउवतल, रायपुर, सारंगढ़ हैं।
  6. प्रवरराज-द्वितीय :-प्रवरराज द्वितीय इस वंश का अंतिम शासक था। सुदेवराज के सामंत इंद्रबल ने प्रवरराज-द्वितीय को मारकर पाण्डुवंश की नींव डाली । ( कौवाताल अभिलेख , महासमुंद )

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