छत्त्तीसगढ़ी बफैलो बनी राज्य की पहली पंजीकृत नस्ल


  1. धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी बफैलो (भैंस) को राज्य की पंजीकृत नस्ल के रूप में प्रमाणित किया गया है। छत्तीसगढ़ कामधेनु विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय पशु अनुवांशिकी ब्यूरो करनाल के संयुक्त प्रयास से छत्तीसगढ़ राज्य की स्थानीय भैंसों का प्रमाणीकरण किया गया है।
  2. कुछ वर्षों से उनके शारीरिक लक्षणों, उत्पादन व प्रजनन विशेषताओं को परखा जा रहा था। शोध कार्य, प्राप्त जानकारी और परिणामों के आधार पर संस्थान ने यहां की स्थानीय प्रजाति की भैंसों को पंजीकृत किया है।
  3. 12 दिसंबर को छत्तीसगढ़ बफैलो के पंजीकरण का प्रमाण-पत्र केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन के हाथों कृषि भवन नई दिल्ली में दिया जाएगा। इस दौरान कुलपति डॉ. नारायण पुरुषोत्तम दक्षिणकर और पशुचिकित्सा, पशुपालन कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. मोहन सिंह उपस्थित रहेंगे।
  4. छत्तीसगढ़ कामधेनु विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. दक्षिणकर ने बताया कि छत्तीसगढ़ राज्य में भैंस वंशीय पशुओं की संख्या लगभग 13.50 लाख है। इनमें 90 फीसद से ज्यादा स्थानीय हैं। बड़े स्तर पर दूध का व्यवसाय जिन संस्थानों हो रहे हैं वहां मुर्रा नस्ल की भैंसें ज्यादा पाली जाती हैं। स्थानीय किसानों के पास, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में देशी भैंसे ही हैं। देश में भैंसों की लगभग 15 प्रजातियां हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य की एक भी पंजीकृत नस्ल इसमें शामिल नहीं है। इसलिए छत्तीसगढ़ी बफैलो का पंजीकरण होना राज्य के लिए गौरव का विषय है।
  5. छत्तीसगढ़ी भैंस मुख्यतः छत्तीसगढ़ के मैदानी क्षेत्रों में पाई जाती है। इनकी संख्या लगभग 9 लाख है। इनका आकार मध्यम, रंग भूरा-काला और सींगें हंसिया के आकार की होती हैं। प्रतिदिन 4 से 6 लीटर दूध देती हैं। इनकी दूध देने की अवधि 250 दिन तक होती है। दूध में वसा का प्रतिशत 7.5 फीसद, लैक्टोस शक्कर 5 फीसद तथा प्रोटीन 4 फीसद होता है। यह दिन भर बाहर घूमती रहती है और रात में उसे खाने के लिए धान का पैरा मिलता है। रिसर्च से जुड़े प्रोफेसर डॉ. मोहन सिंह ने बताया कि छत्तीसगढ़ बफैलो में गर्मी सहन करने के साथ प्रतिरोधक क्षमता अधिक है। इसके अलावा निम्न पोषक तत्वों में भी दूध उत्पादन की क्षमता है।
  6. छत्तीसगढ़ी भैंसों के प्रजनन एवं उनके पोषण, रखरखाव के लिए विशेष नीतिगत निर्णय लिए जाने की आवश्यकता है। इन भैंसों को हरा चारा एवं संतुलित आहार दिया जाए तो निश्चित ही इनके दूध देने की क्षमता बढ़कर 7 लीटर तक पहुंच जाएगी। इसलिए आवश्यकता है इनकी दूध उत्पादन क्षमता के सही आकलन एवं दोहन की। ग्लोबल वार्मिंग एवं क्लाइमेंट चेंज जो भविष्य की चुनौतियां हैं, उनको ध्यान में रखते हुए छत्तीसगढ़ी बफैलो की विशेष उपयोगिता है। विवि में अनुसंधान के माध्यम से छत्तीसगढ़ी भैंसों की उत्पादन क्षमता में बढ़ोतरी के प्रयास चल रहे हैं, ताकि प्रदेश के किसानों की आय पशु पालन से बढ़े।
  7. छत्तीसगढ़ी बफैलो (भैंस) को प्रमाणित राज्य की नस्ल के रूप में मान्य किया गया है। पशुधन सेवा विभाग के साथ किसानों की आर्थिक आय में बढ़ोतरी होगी। राज्य के लिए यह गौरव का विषय है।

 सोर्स – नई दुनिया 

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