इंदिरा गांधी कृषि विवि में पहली बार प्रयोग किया जा रहा है इजराइल की मछली पकड़ने की तकनीक


  1. प्राप्त जानकारी के अनुसार, अब 250 स्क्वायर फीट के सीमेंट के टैंक में मछली का पालन कर सकते है| इस तकनिकी का प्रयोग छत्तीसगढ़ में तकनीक ब्राजील के आधार पर इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में शुरू हो रही है।
  2. विवि के मत्स्य वैज्ञानिक डॉ.एस सासमल ने बताया कि बायोफ्लॉक तकनीक अन्य योजनाओं की अपेक्षा कम खर्चीली व बेहतर उत्पादन देने वाली है। इसे मध्यम मछली पालक अपनाकर छोटी-सी जगह में छह से आठ माह में दो क्विंटल मछली तैयार कर सकते हैं। तैयार मछलियों का वजन आधा से एक किलो होगा, जिसे मार्केट में 100 से 200 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बेचा जा सकता है।
  3. इजराइल, इंडोनेशिया जैसे देशों में मछली के काफी शौकीन हैं। वहां कई परिवार मिलकर मछली पालन बायोफ्लॉक पद्धति से कर हैं। इस व्यवसाय में सबसे अधिक मछली के भोजन पर खर्च आता है। इसमें मछलियों के अपशिष्टों को भोजन में बदलने की तकनीक अपनाई जाएगी। इसके लिए बेनी फिशियल वैक्टीरिया डालेंगे, जिससे मछलियों के दाने पर आ रहा खर्च चौथाई हो जाएगा, जो कि अमूमन दिन भर में मछलियों को दो बार दाना डालना होता है।
  4. बायोफ्लॉक तकनीक के माध्यम से तिलिपियां, मांगूर, केवो, कमनकार जैसी कई मछलियों की पैदावार की जा सकेगी। डॉ. एस सासमल की मानें तो इस तकनीक से किसान महज एक लाख रुपये खर्च कर प्रति वर्ष एक से दो लाख रुपए की कमाई कर सकते हैं।

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