छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास (Part-1 प्रागैतिहासिक काल)


प्रागैतिहासिक काल

प्रागैतिहासिक काल में पूर्ण पाषाण काल, मध्य पाषाण काल, उत्तर पाषाण काल और नव पाषाण काल को शामिल किया गया है

1. पूर्ण पाषाण काल :- 

● इस काल के प्रमाण – छ. ग. के रायगढ़ के सिघंपुर गुफा से प्राप्त शैल चित्रों से मिला है, ( सिंघनपुर में मानव आकृतिया, सीधी डंडे के आकर में तथा सीढ़ी के अकार में प्राप्त हुई है )
● रायगढ़ को शैलाश्रयो का गढ़ कहा जाता है
● राज्य में सबसे अधिक शैलचित्र रायगढ़ से मिला है
● अन्य स्थल : रायगढ़ के बोतल्दा, छापामाडा, भंवरखोल, गीधा सोनबरसा में शैलचित्रों के साथ-साथ लघुपाषाण औजार प्राप्त हुए है।

2. मध्य पाषाण काल :- 

● कबरा पहाड़ में स्थित कबरा गुफा से इस काल से सम्बंधित शैल चित्र मिले है ( लम्बे फलक, अर्द्धचंद्रकार, लघु पाषाण औजार आदि मिले है )

3. उत्तर पाषाण काल : –

● बिलासपुर के धनपुर से इसके प्रमाण मिले है।

● सिंघनपुर की गुफ़ा (रायगढ़ )।

● महानदी घाटी (रायगढ़ )।

● मानव आकृतियों को चित्रित किया गया है ।

● औजारों की आकृतियाँ खुदी हुई थी ।

4. नव पाषाण काल : –

● राजनंदगांव जिले के चितवाडोंगरी, दुर्ग के अर्जुनी, रायगढ़ के टेरम, से इस काल से सम्बंधित चित्रित हथौड़े का प्रमाण प्राप्त हुए है।
[ नोट : राजनांदगांव के चितवाडोंगरी के शैलाश्रयों को सर्वप्रथम श्रीभगवान दास सिंह बघेल तथा डॉ. रमेन्द्र नाथ मिश्र ने उजागर किया है। ]
ताम्र और लौहयुग: –
● दुर्ग के करहीभदर, चिरचारी, में माहापाषाण स्मारक मिले है।
● शवो को गढ़ाने के लिए किये जाने वाला घेरा होता है।
● दुर्ग जिले के घनोरा ग्राम में 500 माहापाषाण स्मारक मिले है।
● बालोद के कर्काभांठा में – माहापाषाण घेरे और लोहे के औजार मिले है।

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