छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास ( Part-08 पाण्डु वंश )

chhattisgarh history notes in hindi

Chhattisgarh history notes –  about pandu vansh

पाण्डुवंशियों ने शरभपुरीय राजवंश को पराजित करने के बाद श्रीपुर को अपनी राजधानी बनाया। ईस्वी सन छठी सदी में दक्षिण कौसल के बहुत बड़े क्षेत्र में इन पाण्डुवंशियों का शासन था।इस वंश का शासन 6 ई से 7 वी ई तक रहा।

प्रसिद्ध शासक

  1. उदयन :- आदिपुरुष कहा जाता है ।
    • संस्थापक, इनके शासन काल का उल्लेख नहीं है।
    • राजधानी :- श्रीपुर (सिरपुर)
  2. इन्द्रबल :
    1. पाण्डुवंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
    2. मांदक में जो अभिलेख प्राप्त हुआ है, उसमें इन्द्रबल के चार पुत्रों का उल्लेख किया गया है।
    3. इंद्रबल के बारे में जानकारी उनके बेटे और उत्तराधिकारी इसनदेव का एक शिलालेख से मिलती है।
    4. इंद्रबल शरभपुरीय शासक सुदेवराज का सामन्त था।
    5. सुदेवराज मृत्यु के बाद प्रवरराज प्रथम शासन काल में पाण्डु वंशी इंद्रबल ने अवसर पाकर उत्तर-पूर्वी भाग में अधिकार कर
    6. शरभपुरीय शासन को समाप्त कर पाण्डु वंश की स्थापना की और श्रीपुर को राजधानी बनाया ।
  3. नन् राज प्रथम :-
    1.  इन्द्रबल का एक बेटा था नन्न। राजा नन्न बहुत ही वीर व पराक्रमी था।
    2. राजा नन्न ने अपने राज्य का खूब विस्तार किया था।
    3. राजा नन्न का छोटा भाई था ईशान-देव। उनके शासनकाल में पाण्डुवंशियों का राज्य दक्षिण कौसल के बहुत ही बड़े क्षेत्र पर फैल चुका था।
    4. खरोद जो बिलासपुर जिले में स्थित है, वहां एक शिलालेख मिला है जिसमें ईशान-देव का उल्लेख किया गया है।
  4. महाशिव तीवरदेव: 
    1. उपाधी-सकलकोशलाधिपति
    2. पाण्डुवंश का उत्कर्ष कल
    3. राजा नन्न का पुत्र महाशिव तीवरदेव ने वीर होने के कारण इस वंश की स्थिति को और भी मजबूत किया था।
    4. महाशिव तीवरदेव को कौसलाधिपति की उपाधि मिली थी क्योंकि उन्होंने कौसल, उत्कल व दूसरे और भी कई मण्डलों पर अपना अधिकार स्थापित किया था।
    5. राजिम और बलौदा में कुछ ताम्रपत्र मिले हैं जिससे पता चलता है कि महाशिव तीवरदेव कितने पराक्रमी थे।
  5. ननदेव द्वितीय :- उपाधि-कोशलमंडलाधिपति
    1. ताम्रपत्र – अंढ़भार (जांजगीर) से प्राप्त हुआ।
    2. महाशिव तीवरदेव का बेटा महान्न उनके बाद राजा हुआ।
    3. वे बहुत ही कम समय के लिये राजा बने थे। उनकी कोई सन्तान न होने के कारण उनके चाचा चन्द्रगुप्त कौसल के नरेश बने।
  6. चंद्रगुप्त का पुत्र हर्षगुप्त :-
  7. हर्षगुप्त:- हर्षगुप्त का विवाह मगध के मौखरी राजा सूर्यवर्मा की पुत्री से हुआ।राजा हर्षगुप्त की पत्नी का नाम वासटा था।हर्षगुप्त की मृत्यु के बाद महारानी वासटा ने पति की स्मृति (600 ई.) में लक्ष्मण मन्दिर का निर्माण करवाया था जो एक विष्णु मंदिर है । यह मन्दिर बहुत ही सुन्दर है। उस काल की वास्तु कला का श्रेष्ठ उदाहरण है। 
  8. महाशिवगुप्त (595-655 ई.) :- हर्षगुप्त के पुत्र । ये शैव धर्म के अनुयायी थे। वे बहुत ही वीर थे। वे और एक नाम से जाने जाते थे :- बालार्जुन। उन्हें बालार्जुन इस लिए कहा जाता था क्योंकि वे धनुर्विद्या में निपुण थे। ऐसा कहते हैं कि वे धनुर्विद्या में अर्जुन जैसे थे। उन्होंने लगभग 60 वर्ष शासन किया ।
    1. इनकी राजधानी- सिरपुर
    2. इसका शासन काल छत्तीसगढ़ इतिहास का स्वर्ण काल कहा जाता है
    3. ह्वेनसांग 639 ईसा को छत्तीसगढ़ की यात्रा की और अपनी रचना सी-यु-की में छत्तीसगढ़ को किया-सलो नाम से वर्णन मिलता है।
    4. सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर का निमार्ण कार्य पूरा किया।
    5. महाशिवगुप्त बालार्जुन ,हर्षवर्धन ,पुलकेशिन-2 तथा नरसिंहवर्मन का समकालिक था।
    6. महाशिवगुप्त के 27 ताम्रपत्र सिरपुर से मिले हैं ।

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